आज एक प्रश्न के साथ शुरुआत करते हैं ।
कहीं हम दिवाली मनाना भूल तो नहीं रहे हैं?
अगर दिवाली मनाने के पीछे एक ही उद्देश्य होता यो कहानी भी एक ही होती न।
लेकिन यहाँ हर समाज और व्यक्ति के पास अलग-अलग कारण दिखता है, फिर तो ऐसा संभव है वास्तविक कारण कोई और ही हो।
समाज में जितनी भी लोक कहानियाँ या पौराणिक कहानियाँ होती है उसमें अधिकांश रूपक (metaphor) में होती है।
मिट्टी का दीया बिलकुल भी प्रदुषण नहीं करेगा, प्लास्टिक वाले लाइट के तुलना में तो न के बराबर।