प्रेम से रहे, प्रेम से रिश्ते निभाये। प्रेम को मोह और मोह को प्रेम समझने की भूल अक्सर होती है। अगर मोह को बन्धन कहा जाये तो प्रेम को आज़ादी कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। प्रेम जहाँ त्याग सिखाता है वहीं मोह आपको सिर्फ स्वयं के बारे में सोचना सिखाता है।