प्रेम से रहे, प्रेम से रिश्ते निभाये। प्रेम को मोह और मोह को प्रेम समझने की भूल अक्सर होती है। अगर मोह को बन्धन कहा जाये तो प्रेम को आज़ादी कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। प्रेम जहाँ त्याग सिखाता है वहीं मोह आपको सिर्फ स्वयं के बारे में सोचना सिखाता है।
गुरु आप किसी को उसके रंग, रूप, वेश आदि के लिए नहीं बनाते। आप गुरु बनाते हैं क्योंकि किसी व्यक्ति विशेष के गुण, उसके कर्म, उसके आचरण, उसके व्यवहार से आप प्रभावित होते हैं। वैसे ही आचरण, वैसे ही कर्म करना चाहते हैं।
उस व्यक्ति विशेष के जैसा ही आप बनना चाहते हैं। यही है गुरु और शिष्य का सम्बंध। एक गुरु के हर शिष्य में उसका गुण विद्यमान रहता है, या ऐसा कह लो हर शिष्य में उसका गुरु छुपा होता है।
वास्तव में गुणों का हस्तांतरण ही गुरु शिष्य परम्परा है।